व्यथा पतंग की

मैं इक अलबेली, रंगबिरंगी पतंग,
बडे अरमानों से मुझे संवारा गया,
आसमां में डोरी बांध उतारा गया,
मेरी अठखेलियां बढाती जश्नए उमंग,
मै इक अलबेली, रंगबिरंगी पतंग।

पर ज्योंही गिरी मैं डोरी से कटकर,
नहीं निकला नयनों से अश्क बहकर,
जमीं पर गिरकर हो गयी मैं बदरंग,
मैं इक अलबेली, रंगबिरंगी पतंग।

अनगिनत बार रौंदी व कुचली गयी,
कचरे के ढेर में जमींदोज कर दी गयी,
मेरी कुर्बानी पर मनाता इन्सां आनन्द,
मैं इक अलबेली, रंगबिरंगी पतंग।

डोरी की चपेट में परिन्दे भी आजाते,
हादसे मानव पर कहां असर कर पाते,
वह नहीं बदलने वाला दानवी रंग-ढंग,
मैं इक अलबेली, रंगबिरंगी पतंग।

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5 thoughts on “व्यथा पतंग की

  1. Aur toh Aur
    Dhaga se chut gaye toh
    Kahin ka na rahi
    😃
    Shiva

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  2. एक पतंग के माध्यम से मानव के सोच को बहुत ही सुंदरता से लिखा है।।उम्दा।।

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